महिलाओं के प्रति विभिन्न प्रकार की हिंसक वारदातें आए दिन देखने को मिलते रहते हैं. छेड़छाड़, दुष्कर्म, घरेलू हिंसा आदि इसमें मुख्य रूप से शामिल हैं. ऐसा नहीं है कि हमारे देश में महिलाओं की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए कड़े कानून नहीं बनाए गए हैं. कानून तो अपना काम इस कदर करती है कि अगर कोई महिला किसी व्यक्ति के उपर झूठे आरोप भी लगा दे तो वह व्यक्ति तुरंत ही गिरफ्तार कर लिया जाता है, चाहे वह निर्दोष ही क्यों न हो. फिर उसे अपना पक्ष न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कर अपने आप को निर्दोष साबित करना होता है.

महिलाओं की सुरक्षा के लिए नियम है, कानून है, पुलिस है, प्रशासन है, थाना है, कोतवाली है, कोर्ट है, कचहरी है. लेकिन एक समय पर इनमें से कुछ भी काम नहीं करता है और महिलाओं के सामने उसके साथ हुई किसी भी तरह की वारदात को अपने दिल के अंदर ही दफन कर देने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता है. इसका कारण मात्र ‘तीन शब्द’ में छिपा है.
अपने बहु-बेटियों-बहनों के साथ छेड़छाड़, दुष्कर्म, घरेलू हिंसा जैसी वारदातें हो जाती हैं
और हमें केवल एक ही डर सता रहा होता है कि ‘लोग क्या कहेंगे’.

वर्तमान के माहौल में हम ऐसा नहीं कह सकते हैं कि भारत एक पुरूष प्रधान देश रह गया है. हमारे समाज में काफी बदलाव आए हैं. साक्षर लोगों का ग्राफ धीरे-धीरे बढ़ ही रहा है. लड़का-लड़की के बीच के भेदभाव को भी काफी हद तक कम किया जा चुका है. लोगों की सोच भी बदली है. इन सबके बावजूद महिलाओं की सुरक्षा एक ही बिंदु पर आकर अटक जाती है. महिलाओं के साथ हुए कई वारदातों में अन्य को छोड़ दें अपने परिवार के लोग ही कानून का सहारा नहीं लेना चाहते.

आखिर ऐसा क्यों होता है?
कारण बस ‘तीन शब्द’ में छिपा है. ये तीन शब्द हैं ‘लोग क्या कहेंगे’. यह ‘तीन शब्द‘ महिलाओं के लिए ऐसा अभिशाप है जहां आकर सभी महिलाएं अपने आप को या तो बिल्कुल अकेला पाती हैं या घुट-घुट कर जिंदा लाश की तरह अपनी बाकी की जिंदगी जी रही होती है. परिवार वाले पढ़े-लिखे और उंचे खानदान से हैं लेकिन डर है कि ‘लोग क्या कहेंगे’. अपने बहु-बेटियों-बहनों के साथ छेड़छाड़, दुष्कर्म, घरेलू हिंसा जैसी वारदातें हो जाती हैं और हमें केवल एक ही डर सता रहा होता है कि ‘लोग क्या कहेंगे’.

ऐसे मामलों में केवल एक बात ही सोचें कि इसमें महिला का क्या कसूर था. अगर किसी महिला के साथ इस तरह की वारदातें होती है तो चुप न बैठें. जागरूक बनें, अपने साक्षरता का परिचय दें और इन हिंसाओं के खिलाफ कानून का सहारा लें. जब तक हम इस तीन शब्द के अभिशाप को तवज्जो देते रहेंगे हमारे-आपके घर की, आसपास की महिलाओं के साथ वारदातें नहीं रूकेंगी. अपने मां-बहनों को इस तरह से वारदातों से निपटने के लिए पूर्ण रूप से तत्पर बनाएं. उन्हें आश्वासन दें कि कहीं भी इस तरह की घटना उनके साथ घटित होती है तो डरें बिल्कुल भी नहीं. नजदीकी थाना अथवा कोतवाली में जाकर तुरंत इसकी जानकारी दें.

एक बार अगर इन आरोपियों के मन में यह बात बैठ जाएगी कि अब महिलायें अपने साथ हुई घटना को बताने में शर्माती नहीं हैं, बेबाकी से अपने साथ हुई एक-एक दरिंदगी के बारे में पुलिस-प्रशासन या अन्य लोगों को बताती हैं. तब तक वह समय आएगा जब इस तरह की घटनों को अंजाम देने वाले दरिंदे ऐसी वारदात को अंजाम देने से पहले ही अंजाम को लेकर डर जाएंगे. इस तरह के कदम महिलाओं को खुद भी उठाना होगा.
‘लोग क्या कहेंगे’, यह सोच कर कभी भी वारदातों को दबाने की कोशिश न करें. अगर आप ऐसा करते हैं तो ऐसी वारदातों को दोबारा करने के लिए खुले तौर पर आरोपी को आप आमंत्रित करते हैं. अपने मन से इस ‘तीन शब्द’ के डर को निकाल फेंकना होगा.