आपको सुनने में अटपटा जरूर लगेगा, पर यह वो कड़वा सत्य है जिसे आपका जानना जरूरी है. बिहार में मैट्रिक, इंटरमीडिएट या स्नातक की परीक्षाओं में धांधली या बच्चों को पास कराने के लिए गलत तरीकों का सहारा लेने का शायद यह पहला मामला नहीं है. शायद ही कोई वर्ष होगा जब हमने टीवी चैनलों या अखबारों में इस तरह के मामले नहीं सुने होंगे. बावजूद इसके इस मामले में प्रशासन का ढीला रवैया कहीं न कहीं शिक्षा विभाग की व्यवस्था प्रणाली पर भी सवाल खड़े करती है.
इन सबके अलावा एक ऐसा कटु सत्य है जिससे मैं आप सभी को रूबरू कराना चाहता हूं. बिहार के ज्यादातर ग्रामीण इलाकों के माता-पिता की मजबूरी होती है कि खासकर लड़कियों को किसी भी हालत में स्नातक तक की डिग्री हासिल करवा दें. इसके लिए वे एड़ी-चोटी एक कर देते हैं. इसका कारण हमारे समाज की एक कुप्रथा है. जी हां! यह कुप्रथा है दहेज प्रथा. दहेज प्रथा एक ऐसी परीक्षा होती है जिसमें माता-पिता को पास होने के लिए अपनी बेटियों को हर संभव किसी भी परीक्षा में पास करवाना जरूरी होता है.
एक तो बिहार की शिक्षा प्रणाली कितनी दुरूस्त है इसका खुलासा आए दिन चैनलों पर देखने को मिलता रहता है. वहां के स्कूलों में छात्रों की जनसंख्या के मुकाबले बहुत ही कम शिक्षक देखे गए हैं. इसके अलावा शिक्षामित्रों की बहाली में धांधली और फिर उन्हीं शिक्षामित्रों को नियमित किए जाने के मामले में भी काफी खुलासे हुए थे. इन कारणों से भी वहां के सरकारी स्कूलों की शिक्षा प्रणाली पर सवाल खड़े हुए हैं.
जहां की सरकारी शिक्षा प्रणाली इतनी खस्ताहाल हो वहां के बच्चों की मजबूरी होती है कि वे अलग से ट्यूशन लें, खुद से मेहनत करें और अपने मेहनत के बलबूते अच्छे नंबरों से पास हों. जिनके माता-पिता के पास पढ़ाई पर अलग से खर्च करने के लिए पैसे होते हैं वे ऐसा करते भी हैं. लेकिन जिनकी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होती वैसे लोगों में बहुत कम ऐसे बच्चे होते हैं जो काफी टैलेंटेड व मेहनती होते हैं और अपने बलबूते अच्छे नंबर लाने की क्षमता रखते हैं और लाते भी हैं. लेकिन बहुत सारे ऐसे होते हैं जिनके बच्चे अच्छी शिक्षा के अभाव में परीक्षाओं में प्रशासन के लचर व्यवस्था का लाभ उठाते हैं और गलत तरीकों से पास हो जाते हैं.
इसी कड़ी में प्रशासन की अनदेखी का फायदा ज्यादातर वैसे माता-पिता उठाते हैं जिन्हें पढ़ाई से ज्यादा अपने बेटियों की शादी की चिंता होती है. इन पैरेंट्सों की सोच होती है कि किसी तरह अगर उनकी बेटी अच्छे नंबरों से पास हो जाए तो शादी के लिए उन्हें अच्छा लड़का भी मिल जाएगा. साथ ही वैसे दहेज लोभी लोग जो अपने लड़कों की शादी केवल लड़की वालों से पैसे ऐंठने के लिए करते हैं अगर लड़की अच्छे नंबरों से इंटरमीडिएट या स्नातक की डिग्री हासिल किए होती है तो उनके माता-पिता को दहेज में थोड़ी नरमी बरतते हैं.
वैसे माता-पिता जिनकी बेटियां अच्छे नंबरों से अच्छी डिग्री हासिल किए होती है इस बात को लेकर निश्चिंत रहते हैं कि अब दहेज में कुछ रकम की रियायत लड़के वालों की तरफ से हो जाएगी और अगर किसी तरह से लड़की किसी जॉब में चली गई है तब तो दहेज लगभग माफ ही हो जाती है. बिहार में रूबी राय जैसी लड़कियों की कमी नहीं है.
रूबी राय जिस परीक्षा में टॉप की है प्रशासन या शिक्षा विभाग के पास शायद इसका कोई जवाब नहीं होगा कि उस सेंटर में बाकी पास किए हुए बच्चों ने चोरी नहीं की है और केवल अपने मेहनत बलबूते पास किए हैं. इस परीक्षा में केवल और केवल प्रशासन और शिक्षा विभाग की लाचारी और बेबसी दिखाई पड़ रही है और कार्रवाई के नाम पर केवल अपनी कमियों को छिपाने की कोशिश की जा रही है.
इन सबके अलावा एक ऐसा कटु सत्य है जिससे मैं आप सभी को रूबरू कराना चाहता हूं. बिहार के ज्यादातर ग्रामीण इलाकों के माता-पिता की मजबूरी होती है कि खासकर लड़कियों को किसी भी हालत में स्नातक तक की डिग्री हासिल करवा दें. इसके लिए वे एड़ी-चोटी एक कर देते हैं. इसका कारण हमारे समाज की एक कुप्रथा है. जी हां! यह कुप्रथा है दहेज प्रथा. दहेज प्रथा एक ऐसी परीक्षा होती है जिसमें माता-पिता को पास होने के लिए अपनी बेटियों को हर संभव किसी भी परीक्षा में पास करवाना जरूरी होता है.
एक तो बिहार की शिक्षा प्रणाली कितनी दुरूस्त है इसका खुलासा आए दिन चैनलों पर देखने को मिलता रहता है. वहां के स्कूलों में छात्रों की जनसंख्या के मुकाबले बहुत ही कम शिक्षक देखे गए हैं. इसके अलावा शिक्षामित्रों की बहाली में धांधली और फिर उन्हीं शिक्षामित्रों को नियमित किए जाने के मामले में भी काफी खुलासे हुए थे. इन कारणों से भी वहां के सरकारी स्कूलों की शिक्षा प्रणाली पर सवाल खड़े हुए हैं.
इसी कड़ी में प्रशासन की अनदेखी का फायदा ज्यादातर वैसे माता-पिता उठाते हैं जिन्हें पढ़ाई से ज्यादा अपने बेटियों की शादी की चिंता होती है. इन पैरेंट्सों की सोच होती है कि किसी तरह अगर उनकी बेटी अच्छे नंबरों से पास हो जाए तो शादी के लिए उन्हें अच्छा लड़का भी मिल जाएगा. साथ ही वैसे दहेज लोभी लोग जो अपने लड़कों की शादी केवल लड़की वालों से पैसे ऐंठने के लिए करते हैं अगर लड़की अच्छे नंबरों से इंटरमीडिएट या स्नातक की डिग्री हासिल किए होती है तो उनके माता-पिता को दहेज में थोड़ी नरमी बरतते हैं.
वैसे माता-पिता जिनकी बेटियां अच्छे नंबरों से अच्छी डिग्री हासिल किए होती है इस बात को लेकर निश्चिंत रहते हैं कि अब दहेज में कुछ रकम की रियायत लड़के वालों की तरफ से हो जाएगी और अगर किसी तरह से लड़की किसी जॉब में चली गई है तब तो दहेज लगभग माफ ही हो जाती है. बिहार में रूबी राय जैसी लड़कियों की कमी नहीं है.
रूबी राय जिस परीक्षा में टॉप की है प्रशासन या शिक्षा विभाग के पास शायद इसका कोई जवाब नहीं होगा कि उस सेंटर में बाकी पास किए हुए बच्चों ने चोरी नहीं की है और केवल अपने मेहनत बलबूते पास किए हैं. इस परीक्षा में केवल और केवल प्रशासन और शिक्षा विभाग की लाचारी और बेबसी दिखाई पड़ रही है और कार्रवाई के नाम पर केवल अपनी कमियों को छिपाने की कोशिश की जा रही है.

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