आजकल पश्चिमी सभ्यता को अपनाने का सिलसिला धड़ल्ले से जारी है. हम अपने आसपास या अपने खुद के बच्चों में पश्चिमी सभ्यता का क्रेज अक्सर देखते हैं. हमारे अंदर के पुराने ख्यालात इस तरह की गतिविधियों को मन ही मन कोसते भी रहते हैं. एक नजरिए से अगर इसमें कुछ खामियां हैं तो दूसरे नजरिए से इसमें बहुत सारी खूबियां भी हैं जिनके कारण अब भारतीय माता-पिताओं ने भी अपने बालिग बच्चों को इसकी मंजूरी देनी शुरू कर दी है.

मुख्य रूप से पश्चिमी सभ्यता दो तरीकों से हम सभी पर हावी हो चला है. पहला और सबसे ज्यादा चलन में फैशन आता है. इस फैशन ने नए ख्यालात वाली लड़कियों को छोटे-छोटे कपड़े पहनना और जमकर जंकफूड खाने को प्रेरित किया. जहां एक तरफ लड़कियों के फैशन पर अक्सर डिबेट्स में कुछ विरोध में तो कुछ समर्थन में अपना पक्ष रखते नजर आ जाते हैं, वहीं अब सुरक्षा व्यवस्था मुस्तैद होने की वजह से कई शहरों में ‘लड़कियों को भी खुलकर जीने की आजादी है’ के नाम पर माता-पिता और वहां के समाज की मंजूरी मिलने लगी है.

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हम सभी की जिंदगी में सबसे अहम मोड़ तब आता है, जब हमें अपने लिए एक ईमानदार जीवनसाथी की तलाश होती है. ऐसा बताया जाता है कि लिव-इन-रिलेशन का क्रेज पश्चिमी सभ्यता में पनपा है. लिव-इन-रिलेशन को अब कई माता-पिताओं ने मंजूरी देनी शुरू कर दी है. अब यह मजबूरी नहीं बल्कि एक-दूसरे को समझने का तरीका बन चुका है. अगर बच्चे लिव-इन-रिलेशन को हद में रहकर निभाएं तो यह वाकई काफी फायदेमंद साबित होती है.

इसका पहला पहलू है कि बेटियों की शादी के लिए पहले की तरह अब पैरेंट्स को रिश्तेदारों के दरवाजे नहीं खटखटाने पड़ते. जैसे-जैसे शादियों में जातपात की पाबंदियां खत्म होती जा रही है वैसे-वैसे लिव-इन-रिलेशन का महत्व दिन-प्रतिदिन बढ़ रहा है. इससे सबसे बड़ा फायदा दोनों जोड़ियों को होता है, जिन्हें पूरा जीवन एक-दूसरे के साथ बिताना है. उन्हें एक-दूसरे को समझने का पूरा-पूरा मौका मिलता है.

हालांकि शादी से पहले लिव-इन-रिलेशन में रहने के दौरान जोड़ियों को खास ध्यान रखना होता है. अगर आपने अपनी हद पार की तो ऐसा संभव है कि एक स्वच्छ और ईमानदार संबंध कायम होने से पहले ही तकरार हो जाए. इस तरह के मामले अक्सर खबरों में देखने को मिल जाते हैं. इस तरह की सावधानी का ख्याल रखना खासकर महिलाओं के लिए ज्यादा महत्व रखता है.

चूंकि लिव-इन-रिलेशन के दौरान बच्चे पूर्ण रूप से अपने साथी को समझने की कोशिश करते हैं और यह सुनिश्चित कर लेते हैं कि सम्पूर्ण जीवन उसके साथ बिताने में उन्हें कोई परेशानी तो नहीं है, शादी-विवाह के मामले में माता-पिता भी अब बच्चों के फैसले को ही अपना आखिरी फैसला मानने लगे हैं. शादी से पहले ही अगर आपको अपने जीवनसाथी को देखने, सुनने और समझने का मौका मिल रहा है तो हम कह सकते हैं कि ‘‘नो टेंशन इन लिव-इन-रिलेशन!’’