प्रसाद की अहमियत हमारी जिंदगी में कितनी है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बगैर नहाए-धोए तो हम उसे ग्रहण तक करना पाप समझते हैं. फिर हमने उसी का नाम बदनाम क्यों कर दिया.



कृपया मेरे लेख को ध्यानपूर्वक पढ़ें और इसके तथ्य को समझने की कोशिश करें, क्योंकि यह कोई ‘बाबा का प्रसाद’ नहीं है. इसे लिखने में धैर्य, समझ और समय भी लगा है.
 
लेख किस बिंदु पर आधारित है शायद आप समझ गए होंगे. मेरी समझ से ‘बाबा का प्रसाद’ मुफ्त में बंटना ही बंद हो जाना चाहिए. हम सबों ने एक तरीके से इसे बदनाम ही कर दिया है.

प्रसाद की अहमियत हमारी जिंदगी में कितनी है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बगैर नहाए-धोए तो हम उसे ग्रहण तक करना पाप समझते हैं. फिर हमने उसी का नाम बदनाम क्यों कर दिया.

हमें यह समझने की जरूरत है कि जिस तरह हम अपनी जिंदगी में बहुत सारी गलत भाषाओं को इस्तेमाल करने से बचते हैं उसी तरह आम जिंदगी में अक्सर हम ऐसी ही भाषाओं को इस्तेमाल कर करते रहते हैं. लेकिन जब कभी हम उनके बारे में सोचते हैं तब जाकर पता चलता है कि अनजाने में व आदत की वजह से हम ऐसी भाषाओं का इस्तेमाल कर जाते हैं जो कायदे से करना नहीं चाहिए.

ऐसी ही बदनाम भाषाओं में हम पवित्र व भगवान का अशीर्वाद समझ कर ग्रहण करने वाले प्रसाद को शुमार कर चुके हैं. आखिर किसी भी कठिन या सबसे न होने पाने वाले कार्य के बारे में हम यह उदाहरण क्यों देते हैं कि यह ‘बाबा का प्रसाद’ नहीं है कि सबसे हो जाएगा.

इसका मतलब तो साफ समझ में आता है कि ‘बाबा के प्रसाद’ की कोई अहमियत नहीं है. जबकि ‘बाबा के प्रसाद’ को हम सभी भगवान का आशीर्वाद समझ कर बड़े ही सम्मान के साथ ग्रहण करते हैं. इसका तोड़ या तो यह हो सकता है कि ‘बाबा का प्रसाद’ मुफ्त में बंटना ही बंद हो जाए और इसे ग्रहण करने के लिए कीमत चुकानी पड़े. शायद तभी हमें इसकी अहमियत का अंदाजा लग पाएगा.