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"दो शब्द दिल से"
चल पड़ा हूं अंधेरे में कि अब उजाले की पैमाइश न करना
चल पड़ा हूं अंधेरे में कि अब उजाले की पैमाइश न करना
Karunesh Kaithal
6:59:00 am
वफाएं छोड़ दी हैं मैंने कि अब शक कि गुंजाइश न करना.
दिन में भी गिनता हूं तारे कि अब चाँद की ख्वाहिश न करना.
आहट भर से तेरी राह में खुशबू बिछा दूंगा, बस इतना करना.
चल पड़ा हूं अंधेरे में कि अब उजाले की पैमाइश न करना.
"दो शब्द दिल से"
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