तेरी पायल से नित्य जो निकलती है धुन,
मग्न कर देती हो जैसे नागिन को बीन,
तुम सूर्य की लाली और चारमीनार हो संगिनी,
लो फिर से कहता हूं तुम कमाल हो संगिनी !

प्यास मेरी यूं ही बुझाती तुम रहना,
मेरी सांसों को यूं ही महकाती तुम रहना,
पंखुरियों में लिपटी तुम गुलाब हो संगिनी,
लो फिर से कहता हूं तुम कमाल हो संगिनी !

लेकिन मलाल मेरे दिल में अब भी है सखी,
खलती है तुम्हारे हुस्न पे एक तिल की कमी,
फिर भी तुम ही ऐश्वर्या, गीता, कुरान हो संगिनी,
लो फिर से कहता हूं तुम कमाल हो संगिनी !

तेरी खुशबू से सुबह, तेरी बांहों में शाम हो जाए,
बस आखिरी पायदान पर एक मुस्कान हो जाए,
मेरे जीवन का तुम उद्धार हो संगिनी,
लो फिर से कहता हूं तुम कमाल हो संगिनी !